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मंगलवार, 10 सितंबर 2019

एक टुकड़ी धूप

दो वर्ष पूर्व हुए हादसे ने रजनीश को पूरी तरह से तोड़ कर रख दिया था चौवन वर्षीय रजनीश की रिटायरमेंट में अभी   छः सात   वर्ष शेष   थे  एक दिन आफिस से वापस लौटते समय ट्रक से लगे धक्के ने कार के पिछले हिस्से को मसल दिया और साथ ही उसके  जीवन के  उत्साह  और  उमंग  को  भी।सीट में  फंस जाने के  कारण  उसका कमर  के नीचे  का हिस्सा  पूरी  तरह  अचल  हो  चुका था। वह  जिंदादिल  रजनीश  जो  कभी पार्टियों  की  जान  हुआ करता था  आज  उसकी  पूरी दुनिया  एक  कुर्सी  व  बिस्तर  तक  सीमित  रह गई थी। कुछ  दिनों  तक  तो  आने जाने वालों  से  घर   में  रौनक  रही पर  कुछ  ही दिनों में  यह सन्नाटा  उसे  काटने  दौडने  लगा। ईश्वर की लीला भी अजीब ही है इतना बड़ा शरीर है बरसों बरस चलता रहता है पर एक सुई भी धँस  जाए तो सांस तक उसी में अटक जाती है, और यहाँ  तो बात बिलकुल ही अलग थी  रजनीश की तो पूरी दुनिया  ही बदल चुकी थी 
निशा इस समय सच्ची जीवन संगिनी का धर्म निभा रही थी ।उसकी वजह से उसका  भी जीवन बंध गया था । जब एक असीम संतोष और धैर्य के साथ  वह  अपने पूरे कर्त्तव्यों  निर्वाह करती   तो वह और अपराधबोध से भर उठता ।मन  में उपजती  विषमताएँ  निराशा को  बसेरा  प्रदान  करती  जा रही  थीं  

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